साहित्य, साहस और संस्कार का संगम: श्री श्री विश्वविद्यालय में ‘साहित्य संवाद’ ने जगाई नई प्रेरणा

प्रेरणा का उत्सव ‘साहित्य संवाद’

श्री श्री विश्वविद्यालय में आयोजित प्रेरणादायी कार्यक्रम साहित्य संवाद’ के अवसर पर भारतीय थलसेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल जी. डी. बक्शी ने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि जीवन में जीवित रहना ही उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।

उन्होंने एक रोचक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार जब उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था, उस समय भारत के पूर्व कैबिनेट सचिव और चुनाव आयुक्त टी. एस. सुब्रमण्यम ने उनसे प्रश्न किया था, “मेजर बक्शी, आपने इतने वर्षों तक देश की सेवा की है। आपके जीवन की सबसे बड़ी घटना कौन-सी है ?” इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा, “मेरे लिए जीवित रहना ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है। अपने सैन्य जीवन में मैंने अनेक युद्धों और कठिन परिस्थितियों का सामना किया है। उन युद्धों के दौरान मैंने अपने सैनिक साथियों को बहुत करीब से वीरगति प्राप्त करते हुए देखा है। ऐसे में आज भी जीवित रहना मेरे लिए जीवन की सबसे बड़ी घटना और सबसे बड़ी उपलब्धि है।”

भगवद्गीता की शिक्षाओं से जीवन का मार्गदर्शन

कार्यक्रम के दौरान मेजर जनरल बक्शी ने भगवद्गीता की जीवन्त शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक महान कला सिखाने वाली मार्गदर्शिका है। उन्होंने अपने सैन्य जीवन के अनेक साहसिक अभियानों और अनुभवों के उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और कर्तव्यनिष्ठा बनाए रखी जा सकती है।

उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न अनुभवों, अनुभूतियों और संघर्षों का उल्लेख करते हुए यह भी बताया कि भय पर विजय कैसे प्राप्त की जा सकती है। उनके प्रेरणादायी विचारों ने उपस्थित विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों को गहराई से प्रभावित किया।

1971 के युद्ध की दर्दनाक स्मृति

अपने संबोधन में उन्होंने वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध की एक अत्यंत मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उनके सहयोगी सेकंड लेफ्टिनेंट महेंद्र प्रताप सिंह को पाकिस्तानी सेना ने अत्यंत क्रूर और यातनापूर्ण मृत्यु दी थी।

इस घटना को याद करते हुए उन्होंने युद्ध की भयावहता और सैनिकों के बलिदान को रेखांकित किया। उन्होंने यह भी बताया कि उसी युद्ध के परिणामस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के लगभग 93 हजार सैनिकों को युद्धबंदी बनाया था, जो विश्व इतिहास में युद्धबंदियों की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक माना जाता है।

श्री श्री विश्वविद्यालय की प्रशंसा

मेजर जनरल बक्शी ने श्री श्री विश्वविद्यालय के प्राकृतिक वातावरण और विकास की भी भरपूर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि जहाँ पहले मोरम की खदानों वाला एक उजाड़ क्षेत्र था, वहीं आज विश्वविद्यालय प्रशासन के प्रयासों से यह स्थान हरियाली से भर गया है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि विश्वविद्यालय परिसर में डेढ़ लाख से अधिक वृक्षों का रोपण किया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अत्यंत सराहनीय पहल है। उन्होंने यह भी बताया कि परिसर में उनके प्रिय बोगनविलिया के फूल लगाए गए हैं, जिससे उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हुई। विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों की उपस्थिति और प्राकृतिक सौंदर्य इस स्थान को एक स्वर्गीय अनुभव प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि यहाँ उन्होंने सुबह योगाभ्यास से अपने दिन की शुरुआत की और चारों ओर गूँजते वैदिक मंत्रोच्चार ने उनके मन में अद्भुत शांति और आनंद का अनुभव कराया। मेजर जनरल बक्शी ने विश्वविद्यालय के नेतृत्व, शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

साहित्य और संस्कृति पर विचार-विमर्श

इस दिनभर चलने वाले कार्यक्रम में प्रसिद्ध अंग्रेज़ी साहित्यकार एवं कॉर्पोरेट व्यक्तित्व संजय सरीन भी उपस्थित रहे। उन्होंने विद्यार्थियों को भारतीय साहित्य की परंपरा, उसकी व्यापकता और आधुनिक समय में उसकी प्रासंगिकता के बारे में अनेक महत्वपूर्ण और उपयोगी बातें बताईं।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की कुलाध्यक्षा प्रोफेसर रजिता कुलकर्णी, आर्ट ऑफ लिविंग डब्ल्यूडब्ल्यूएससीसी की अध्यक्ष भानुमति नरसिंहन, ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ओड़िया साहित्यकार पद्मभूषण डॉ. प्रतिभा राय, प्रसिद्ध अनुवादक, समीक्षक और स्तंभकार प्रोफेसर यतीन्द्र नायक, विख्यात उपन्यासकार गौरहरि दास, सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता सत्यव्रत (कुना) त्रिपाठी, बैंकर मिहिर पटनायक तथा जगन्नाथ संस्कृति के शोधकर्ता डॉ. पीतवास राउतराय सहित अनेक विशिष्ट अतिथियों ने विभिन्न सत्रों में अपने विचार प्रस्तुत किए।

इन सभी विद्वानों और विशिष्ट व्यक्तित्वों ने साहित्य, संस्कृति, समाज और मानवीय मूल्यों से जुड़े विविध विषयों पर गहन और सारगर्भित चर्चा की।

वक्ताओं ने अपने वक्तव्यों में इस बात पर विशेष बल दिया कि साहित्य केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने वाली एक शक्तिशाली माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि साहित्य के माध्यम से समाज की समस्याओं को समझने, मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने और नई पीढ़ी को सकारात्मक विचारों की ओर प्रेरित करने की अपार क्षमता होती है।

इस अवसर पर अतिथियों ने भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा, उसकी विविधता और उसकी वैश्विक प्रासंगिकता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के दौरान कई वक्ताओं ने अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों, संघर्षों और उपलब्धियों को साझा किया, जिससे उपस्थित विद्यार्थियों को जीवन में धैर्य, अनुशासन, परिश्रम और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा मिली। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे साहित्य, कला और संस्कृति के माध्यम से अपने विचारों को विकसित करें तथा समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें।

संवादात्मक वातावरण में आयोजित इन सत्रों के दौरान विद्यार्थियों ने भी अतिथियों से अनेक जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे। अतिथियों ने बड़े ही आत्मीय और सरल ढंग से उनके प्रश्नों का उत्तर दिया, जिससे कार्यक्रम और भी जीवंत तथा रोचक बन गया। कई विद्यार्थियों ने इस अवसर को अपने लिए अत्यंत प्रेरणादायी और ज्ञानवर्धक बताया।

अतिथियों ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण, विद्यार्थियों की जिज्ञासा और कार्यक्रम के उत्कृष्ट आयोजन की भी सराहना की।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार के साहित्यिक और बौद्धिक कार्यक्रम विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा उन्हें व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। साथ ही उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में भी इस प्रकार के रचनात्मक और प्रेरणादायी आयोजनों का सिलसिला निरंतर जारी रहेगा।

डॉ. प्रतिभा राय का प्रेरणादायी वक्तव्य

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता और पद्मभूषण से सम्मानित ओड़िया साहित्यकार डॉ. प्रतिभा राय बचपन से ही अपने स्वतंत्र और नारीवादी विचारों के लिए जानी जाती रही हैं। उनके प्रसिद्ध उपन्यास याज्ञसेनी’ के लिए उन्हें भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है। अपने संबोधन में उन्होंने पुरुषप्रधान समाज में महिलाओं की स्थिति और उनकी भूमिका पर गंभीर विचार व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि बचपन से ही उनके मन में यह प्रश्न उठता था कि महिलाएँ समाज में पूर्ण स्वतंत्रता और समानता क्यों नहीं प्राप्त कर पातीं। उन्होंने बताया कि उनके पिता हमेशा उन्हें न्याय के पक्ष में खड़े रहने की प्रेरणा देते थे।

डॉ. प्रतिभा राय ने एक रोचक घटना साझा करते हुए बताया कि एक बार उनके पैतृक गाँव, जो जगतसिंहपुर जिले में स्थित है, वहाँ महाभारत पर आधारित एक नाटक का मंचन हो रहा था। उस नाटक में द्रौपदी के चीरहरण का दृश्य देखकर उनका मन बहुत विचलित हो गया। घर लौटने के बाद उन्होंने अपने पिता से पूछा कि जब कुरु सभा में इतने बड़े-बड़े योद्धा और विद्वान उपस्थित थे, तब भी किसी ने द्रौपदी की रक्षा के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठाई ?” यह प्रश्न उनके मन में लंबे समय तक गूंजता रहा और बाद में उनके साहित्यिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण आधार बना।

बचपन से स्वतंत्र स्वभाव

उन्होंने यह भी बताया कि बचपन से ही उनका स्वभाव अत्यंत स्वतंत्र था। जिस समय गाँव में पुरुषों के लिए भी साइकिल चलाना एक दुर्लभ बात थी, उस समय वे अपनी बहनों के साथ साइकिल चलाकर गाँव के एक छोर से दूसरे छोर तक घूम लिया करती थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, मैं प्रतिदिन सूर्यास्त देखने के लिए साइकिल चलाकर लगभग तीन किलोमीटर दूर तक जाती थी। लेकिन अफसोस, सूर्य तक पहुँचने से पहले ही सूर्यास्त हो जाता था।” उन्होंने साधना और सिद्धि के बीच के संबंध को भी अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली ढंग से समझाया।

कार्यक्रम का शुभारंभ और संचालन

कार्यक्रम की शुरुआत प्रशासनिक अधिकारी सौरभ बावेजा द्वारा अतिथियों के परिचय से हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. तेजप्रताप ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ ओडिसी नृत्य की प्रसिद्ध प्रस्तुति दशावतार’ से हुआ, जिसने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस कार्यक्रम में लगभग 300 से अधिक दर्शकों ने भाग लिया।

विश्वविद्यालय की ओर से विभिन्न सत्रों का संचालन डॉ. विप्लव बिश्वाल, डॉ. भरत दास, डॉ. केशरी सिंह, डॉ. मधुमिता दास, डॉ. राकेश त्रिपाठी और डॉ. डी. डी. स्वाईं ने किया।

कार्यक्रम की सफलता के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ. तेजप्रताप, कुलसचिव डॉ. अनिल कुमार शर्मा, कार्मिक निदेशक स्वामी सत्यचैतन्य, छात्र कल्याण विभाग के डीन प्रोफेसर डॉ. जयप्रकाश भट्ट, तथा मानव संसाधन विभाग के उपनिदेशक ज्योतिरंजन गड़नायक सहित सभी आयोजकों को धन्यवाद ज्ञापित किया गया।







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