एक खोई हुई ऊर्जा, एक लहूलुहान आस्था और पुनर्जागरण की हज़ारों वर्षीय यात्रा

(गुजराट सौराष्ट्रस्थित सोमनाथ मन्दिर का विहंगाबलोकन)

मनुष्य का ज्ञान, चाहे कितना भी विस्तृत क्यों न हो जाए, उसके सामने ब्रह्मांड का रहस्य सदैव एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर खड़ा रहता है। सभ्यताएँ अपने विज्ञान पर गर्व करती हैं, किंतु अनंत के सामने विज्ञान भी उतना ही विनम्र हो जाता है जितनी आस्था। यही कारण है कि जब विश्वास किसी जनश्रुति को पुष्ट करता है और विज्ञान उसे प्रमाणों से सहलाता है, तब यह संसार अपनी गहनता का एक नया द्वार खोल देता है। भारत, जो असंख्य रहस्यों का प्राचीन पालना है, उसकी मिट्टी में ऐसी अनेक कथाएँ दबी पड़ी हैं, जिनकी प्रतिध्वनि केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि भविष्य भी सुनना चाहता है। इस आलेख्य में हम उसी ध्वनि को सुनने का प्रयास करते हैं, एक ऐसे रहस्य की जो धर्म और विज्ञान, पुराण और प्रयोगशाला, आस्था और ऊर्जा सभी को एक ही बिंदु पर लाकर खड़ा कर देता है। यह कथा केवल पढ़ी नहीं जाती यह आत्मा के भीतर उतरती है।

 प्राचीन भारत के हृदय में उठती तूफ़ानी लहरें

(ज्योतिर्लिंगों का वह मनमोहक दृश्य)

सन् 1026 का समय। भारत उस युग में महान समृद्धि के चरम पर था। भव्य मंदिर, विशाल नगर, जीवन्त कला, असीम ज्ञान, भारत की भूमि हर तरफ स्वर्णिम प्रकाश की तरह फैली हुई थी। परंतु इसी प्रकाश से ईर्ष्या रखने वाले कई आक्रमणकारी पश्चिम से चले आते थे, जैसे अंधकार प्रकाश को निगलने की चेष्टा करता है। ग़ज़नी का महमूद - इतिहास के पन्नों में जिसकी तलवार की खनक आज भी सुनाई देती है। वह न केवल क्रूर था, बल्कि भारत की आध्यात्मिक रीढ़ पर प्रहार करने के लिए दृढ़संकल्पित था। उसके 18 आक्रमण सिर्फ एक सैनिक अभियान नहीं थे,  वे इस भूमि की संस्कृति, आस्था और अस्मिता पर प्रहार थे। फिर भी, भारत की आत्मा इतनी दृढ़ थी कि बार-बार खून और आँसू में भीगी मिट्टी से वही पुरानी सुगंध उठ खड़ी होती, सब कुछ सहकर भी मुस्कुराने वाली, अडिग और अमर। परंतु इस बार महमूद का लक्ष्य केवल सोना, रत्न या संपदा नहीं थे। उसकी आँखें टिकी थीं सोमनाथ पर। भारत के आध्यात्मिक हृदय पर।

सोमनाथ - चंद्रदेव की पीड़ा और शिव की शरण

(अपनी पीड़ा हरण के लिये चंद्रदेव महादेव को पूजते हुए)

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्राचीन सोमनाथ के बारे में कहा जाता है कि यह केवल एक मंदिर नहीं था, यह चंद्रदेव द्वारा स्थापित एक उर्जा-स्रोत था। पुराण कहते हैं,  चंद्रदेव, जो सौंदर्य के प्रतीक थे, जिन्हें सभी देवता आदर देते थे, एक समय असहनीय पीड़ा में डूब गए। यह पीड़ा शारीरिक नहीं, मानसिक थी। उनके मन पर अंधकार छा गया था, और चंद्रमा का मन विचलित हो जाए, तो ब्रह्मांड की लय तक विचलित हो जाती है। उन्हें किसी ऐसे आश्रय की आवश्यकता थी जहाँ मन शांत हो सके। उन्होंने महादेव का ध्यान किया, और इसी भूमि पर सौराष्ट्र के तट पर शिव का तेज प्रकट हुआ। उनकी आराधना से चंद्र का मन शांत हुआ। शिव ने उन्हें कण-कण से राहत दी, और उसी क्षण से शिव कहलाए, “सोम-नाथ” अर्थात् चंद्रमा के स्वामी। यहाँ स्थापित ज्योतिर्लिंग में कोई साधारण ऊर्जा नहीं थी। यह एक रहस्य था, एक प्रयोग था, एक दिव्यता थी। जिसे केवल महादेव और उनका सान्निध्य जानता था।

वह अद्भुत ज्योतिर्लिंग जो हवा में तैरता था

(सोमनाथ मंदिर में विद्यमान वर्तमान ज्योतिर्लिंग)

प्राचीन ग्रंथों, यात्रियों के वृत्तांतों और ऐतिहासिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि सोमनाथ का मूल ज्योतिर्लिंग भूमि को स्पर्श नहीं करता था। वह शून्य में स्थिर था। वह हवा में झूलता था, मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उसे थाम रखा हो। आज विज्ञान इसे मैग्नेटिक लेविटेशन कहता है। परंतु उस समय यह केवल एक चमत्कार था, एक दिव्य यथार्थ। नीचे की चट्टान और ऊपर के लिंग में ऐसी चुम्बकीय शक्ति थी कि दोनों के बीच संतुलित विकर्षण बल पैदा होता था। यह दृश्य लोगों को अपनी ओर खींच लेता था। और यही दृश्य महमूद को उकसाने वाला बना।

महमूद का प्रहार: जब आस्था पर तलवार चली

(आक्रांता महमूद गज़नी सोमनाथ के प्रदेश को विध्वस्त करते हुए)

जब महमूद पहली बार सोमनाथ पहुँचा, उसने मंदिर के द्वार पर कदम रखते ही देखा एक श्वेत आभा, जिसके केंद्र में लटकता हुआ वह ज्योतिर्लिंग। उसकी सेना भयभीत हो उठी। महमूद स्वयं भी क्षणभर मौन रह गया, जैसे किसी अगम्य शक्ति ने उसे रोक लिया हो। परंतु उसकी भक्ति नहीं जागी। जागा केवल उसका क्रोध, की इस चमत्कार का आधार केवल हिंदुओं की आस्था है और उसे तोड़ देना चाहिए। और उसने वही किया- जिसकी गूँज आज भी समय की गलियों में सुनाई देती है। वह गरजा, उसने प्रहार किया, बार-बार और निष्ठुरता से। ज्योतिर्लिंग के खंड टूटकर चारों ओर बिखर गए। मंदिर की दीवारें रो पड़ीं, समुद्र की लहरें उग्र हो उठीं, आस्था कराह उठी। परंतु… जिन हाथों ने पीढ़ियों से पूजा की थी, उन्हीं हाथों ने रात के सन्नाटे में उन पवित्र खंडों को समेट लिया। वे उन्हें लेकर भागे नहीं,  वे उन्हें लेकर संस्कृति को जीवित रखने चले गए।

अग्निहोत्री वंश: जिन्होंने हज़ार वर्ष तक दीपक नहीं बुझने दिया

(सीताराम शास्त्री गुरुदेव को ज्योतिर्लिंग हस्तान्तरण करते हुए)

अग्निहोत्री ब्राह्मणों ने उन खंडों को अपने घर में छिपाकर रखा। उन्होंने उन्हें पुनः जोड़ने का प्रयास किया, उन्हें यथासंभव लिंगाकार रूप दिया, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस धरोहर को आगे बढ़ाया। जैसे परिवार अपने सबसे बड़े रत्न को सँभालता है, वैसे ही उन्होंने इस खंडित ज्योतिर्लिंग को अपने हृदय में बसाया। शासन बदलते गए - तुर्क, अफ़ग़ान, मुगल, अंग्रेज़ - परंतु किसी ने यह नहीं जाना कि भारत की सबसे प्राचीन आध्यात्मिक ऊर्जा कहाँ छिपी है क्योंकि इसका रहस्य उनके खून में, उनके व्रत में, उनकी श्रद्धा में समाया था।

कांची शंकराचार्य की भविष्यवाणी और सौ साल का इंतज़ार

वर्ष 1924... कांची पीठ के शंकराचार्य ने अग्निहोत्री वंश से कहा,  “सौ वर्ष बाद, इन पवित्र खंडों को गुरु श्री श्री रविशंकर को सौंप देना। सदियों बाद वे ही इनके योग्य संरक्षक होंगे।” यह भविष्यवाणी कोई साधारण निर्देश नहीं थी। यह समय को दिया गया आदेश था। और समय कभी अपने आदेश का उल्लंघन नहीं करता।

(ज्योतिर्लिंग की असल दिव्यता और भव्यता शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती)

वर्ष 2025: भविष्यवाणी की पुनर्पूर्ति

(ज्योतिर्लिंगों का वंदन करते हुए गुरुदेव श्री श्री रविशंकर)

ठीक सौ वर्ष बाद, जनवरी 2025। अग्निहोत्री ब्राह्मण सीताराम शास्त्री, जो पिछले 21 वर्षों से इन खंडों की देखभाल कर रहे थे, बेंगलुरु आश्रम पहुँचे। उनके हाथों में वह इतिहास था जो हज़ार वर्ष से समय की आँखों से छिपा था। गुरुदेव जब इन खंडों के पास पहुँचे, तो वातावरण में ऐसी शांति फैल गई मानो समय स्वयं सम्मान में खड़ा हो गया हो। सीताराम शास्त्री ने कहा,  “घर में आत्मार्थ पूजा होती है, मंदिरों में परार्थ पूजा। अब ये खंड समाजोपयोगी पूजन के योग्य हैं, मैं इन्हें गुरुदेव को समर्पित करता हूँ।” गुरुदेव की आँखें नम थीं। समर्पण स्वीकारा गया। सदी पुरानी भविष्यवाणी पूर्ण हुई।

11 खंडों की राष्ट्र-यात्रा: एक नए युग की शुरुआत

(ज्योतिर्लिंग अपने मूल स्वरूप में अद्भुत भव्यता और दिव्यता के साथ चमकता है)

गुरुदेव ने निर्णय लिया कि ये खंड पूरे भारत में ले जाए जाएँ ताकि जन-जन इनके दर्शन कर सके। पिछले एक वर्ष में भारत के 30 राज्यों में यह दिव्य ऊर्जा लोगों ने अनुभव की। जहाँ-जहाँ खंड पहुँचे, वहाँ-वहाँ श्रद्धा का ऐसा ज्वार उठा कि लोग कहते,  “मानो महादेव स्वयं पधार आए हों।” आख़िरकार इन्हें मूल स्थान सोमनाथ में पुनः स्थापित किया जाएगा। सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस निर्णय के प्रमुख होंगे।

विज्ञान की निर्णायक गवाही, जो आज भी अनसुलझी है

(गुरुदेव ज्योतिर्लिंगों को विश्वभर में दर्शन के लिए ले जा रहे हैं)

विज्ञान ने जब इन खंडों की जाँच की, जो निष्कर्ष आए, वे मानव चेतना को हिला देने वाले थे: यह पत्थर सफ़ेद, जबकि चुम्बकीय चट्टानें सामान्यतः काली होती हैं। लोहे की मात्रा लगभग शून्य, जबकि चुम्बकत्व के लिए लोहे को आवश्यक माना जाता है। चुम्बकीय क्षेत्र किनारों पर नहीं, बल्कि केंद्र में, जो किसी ज्ञात भू-नियम से मेल नहीं खाता। देखाजाए तो आयु भी हज़ारों वर्षों से भी अधिक पुरानी। भू-वैज्ञानिक चंद्रशेखर ने कहा, “मैंने ऐसा पत्थर पृथ्वी पर कभी नहीं देखा। यह ज्ञात विज्ञान के बाहर की वस्तु है।” विज्ञान के पास प्रश्न थे, उत्तर नहीं। आस्था के पास उत्तर था, वह अनुभव था जिसे विज्ञान नाप नहीं सकता।

यह केवल इतिहास नहीं, यह पुनर्जागरण का प्रारंभ है

इसी क्रम में, श्री श्री विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में (संयोगवश, यह भी गुरुदेव द्वारा स्थापित श्री श्री विश्वविद्यालय का द्वादश दीक्षांत समारोह था) शामिल हुए गुरुदेव अपने साथ उन पवित्र ज्योतिर्लिंगों को लेकर आए थे। द्वादश दीक्षांत समारोह के अवसर पर गुरुदेव ने द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को साथ लेकर आगमन किया। ओडिशा के विभिन्न जिलों में उत्सुक जनसाधारण के दर्शन हेतु इसे आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवकों द्वारा ले जाया गया। इसके बाद, इन्हें बेंगलुरु आश्रम ले जाने से पूर्व, विश्वविद्यालय परिसर में रुद्राभिषेक अथवा रुद्र पूजा आयोजित की गई। पूजा के उपरांत, इन अलौकिक ज्योतिर्लिंगों को लेकर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) तेजप्रताप तथा कार्मिक निदेशक स्वामी सत्यचेतन्य स्वतंत्र रूप से बेंगलुरु के लिए प्रस्थान कर गए। सोमनाथ के खंडित ज्योतिर्लिंग की यह यात्रा भारत की संस्कृति का इतिहास नहीं, उसका पुनर्जन्म है। यह सिखाती है कि आस्था चाहे कितनी भी चोट खाए, जब समय उचित होता है, वह पूर्व की अपेक्षा अधिक तेजस्वी रूप में फिर खड़ी होती है।

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ଅଲୌକିକ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗର ଅବିସ୍ମରଣୀୟ ଯାତ୍ରା: ଭକ୍ତି, ବିଜ୍ଞାନ ଓ ଇତିହାସର ତୀର୍ଥ


(ସୋମନାଥଙ୍କ ଅଲୌକିକ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ)

ଯେତେବେଳେ ଭଗବତ୍ ବିଶ୍ୱାସ ଜନଶ୍ରୁତିକୁ ପରିପୁଷ୍ଟ କରେ ଓ ବିଜ୍ଞାନ ତାହାକୁ ଇନ୍ଧନ ଯୋଗାଏ, ସେତେବେଳେ ଧରି ନେବାକୁ ହେବ ଏ ଦୁନିଆର କିୟଦଂଶ ମଧ୍ୟ ଆମେ ଆହରଣ କରିନାହୁଁ । କାରଣ ବିଶ୍ୱ ହେଉଛି ନାନା ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ । ଆଉ ଆମେ ହେଉଛୁ, ତହିଁରେ ମାତ୍ର ପହଁରି ବୁଲୁଥିବା ସମୁଦ୍ର କୂଳର ବାଲି ରଗଡ଼ାଟିଏ ଭଳି । ଇଏ ହେଉଛି ହଜାରେ ବର୍ଷ ତଳର କାହାଣୀ । ଆପଣ ତାକୁ କହିପାରନ୍ତି କାହାଣୀ ଅବା କିମ୍ବଦନ୍ତୀ, ମାତ୍ର ତା ପଛରେ ସନ୍ନିହିତ ଥିବା ଇତିହାସ ଏବଂ ବିଜ୍ଞାନ ସମ୍ଭୁତ କାରଣଟିକୁ ବା ଅସ୍ୱୀକାର କରିବେ କିପରି ! ଆସନ୍ତୁ ତେବେ ଜାଣିବା ସେହି ଲୋମହର୍ଷଣକାରୀ ଅଥଚ ସତ ଘଟଣାଟିକୁ... ।  

    ଆଜିକୁ ହଜାରେ ବର୍ଷ ତଳର କଥା । ତାହା ଥିଲା 1026 ମସିହାର ସମୟ । ମୁଁ, ଆପଣ, ଆମେ ସମସ୍ତେ ବିଦ୍ୟାଳୟ ଜୀବନରେ ଇତିହାସରେ ପଢ଼ିଛେ, କିଭଳି ମୋଗଲ୍ ଆକ୍ରମଣକାରୀ ଗଜନୀର ମାମୁଦ ଥରକୁ ଥର କରି ପ୍ରାୟ 18 ଥର ଧରି ଭାରତକୁ ଆକ୍ରମଣ କରିଥିଲା । ଦେଶର ସାର୍ବଭୌମତ୍ୱକୁ ଖଣ୍ଡ ବିଖଣ୍ଡିତ କରିଥିଲା, ମର୍ଯ୍ୟାଦାକୁ କରିଥିଲା ମଥାନତ ଆଉ ଶାସକ-ପ୍ରଶାସକମାନଙ୍କ ଅହଂକୁ ଭୁଲୁଣ୍ଠିତ । ମାମୁଦର ବାରମ୍ବାର ଆକ୍ରମଣ ଏବଂ ଅତ୍ୟାଚାରର ଶିକାର ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଏ ବିରାଟ ଦେଶର ସଂସ୍କୃତିସମ୍ପନ୍ନ ଜାତିଟା ଜିଇଁବାର ଆଶା ହରାଇ ନ ଥିଲା । ତୃଣଭୋଜୀ ପ୍ରାଣୀଟିର ପାକୁଳିରେ ଥରକୁ ଥର ପେଶି ହୋଇଯାଉଥିବା ସେ ନଣ୍ଡା ପଡ଼ିଆର ଘାସ ପରି ବାରମ୍ବାର ଗଜୁରୁଥିଲା ଏ ଜାତିର ସଭ୍ୟତା, ସଂସ୍କୃତି ଆଉ  ପରମ୍ପରା । ହଜାର ହଜାର ବର୍ଷର ସେ ମହାନ୍ ପରମ୍ପରା ସମୟର କଷଟି ପଥରରେ ପରଖି ହୋଇ ପାଲଟି ଯାଉଥିଲା ପରଶମଣି । ଆଉ ତା ଆଗରେ ବା ସେ ସାମାନ୍ୟ ମୋଗଲ ଆକ୍ରମଣକାରୀର କେତେ ବଳ ! ସୁନାର ଭାରତବର୍ଷରୁ ଧନସମ୍ପତ୍ତି ଓ କନ୍ୟାରତ୍ନ ଲୁଣ୍ଠନ କରି ହୁଏତ ମାମୁଦର ମନ ବୁଝି ନ ଥିଲା । ସେଥିପାଇଁ ସେ ଏ ଜାତିର ଐତିହ୍ୟ ଓ ପରମ୍ପରା ଉପରେ କୁଠାରାଘାତ କରିବାକୁ ଚାହିଁଲା । ତାର ଲୋଲୁପ ଦୃଷ୍ଟିରୁ ବର୍ତ୍ତି ପାରି ନ ଥିଲା ହିନ୍ଦୁ ଧର୍ମର ଆରାଧ୍ୟ ପ୍ରଭୁ ସୋମନାଥଙ୍କ ମନ୍ଦିର ।

 

(ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ ଅଂଶବିଶେଷ ସହ ଗୁରୁଦେବ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ରବିଶଙ୍କର)

    ଦ୍ୱାଦଶ ଶିବଲିଙ୍ଗ ମଧ୍ୟରୁ ଅନ୍ୟତମ ଗୁଜରାଟ ସୌରାଷ୍ଟ୍ର ଗିର୍ ସୋମନାଥସ୍ଥିତ ଏହି  ପବିତ୍ର ଶିବ ମନ୍ଦିରକୁ ବାରମ୍ବାର ଲୁଣ୍ଠନ କରିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ମାମୁଦର ମନ ବୁଝି ନ ଥିଲା । ଥରକୁ ଥର ଆକ୍ରମଣ କରି ଧନ ସମ୍ପତ୍ତି ଲୁଟି ନେବାପରେ ହିନ୍ଦୁମାନଙ୍କ ଆସ୍ଥା ଉପରେ ସେ କରିଥିଲା ଚରମ ଆଘାତ । ଶେଷରେ ସୋମନାଥଙ୍କ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗକୁ ନାନାଦି ଅସ୍ତ୍ରଶସ୍ତ୍ରରେ ଆଘାତ ପୂର୍ବକ ଭାଙ୍ଗି ଦେଇଥିଲା । ଶିବଲିଙ୍ଗ ଭାଙ୍ଗି ଖଣ୍ଡ ଖଣ୍ଡ କରିଦେବା ପରେ ସେ ସ୍ଥାନ ଛାଡ଼ି ଚାଲି ଯାଇଥିଲା । ତେବେ ସୋମନାଥଙ୍କ ପୂଜା ଦାୟିତ୍ୱରେ ଥିବା ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ କୌଣସି ମତେ ନିଜ ଆରାଧ୍ୟ ଦେବତାଙ୍କୁ ଉଦ୍ଧାର କରିବାରେ ସକ୍ଷମ ହେଲେ । ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗର ଖଣ୍ଡବିଖଣ୍ଡିତ ଟୁକୁରାଗୁଡ଼ିକୁ ଏକାଠି କରି ଘରକୁ ଘେନିଗଲେ । ଏହାପରେ ଗୋପନରେ ନିଜ ହେପାଜତରେ ରଖିଲେ । ଭଙ୍ଗା ଖଣ୍ଡଗୁଡ଼ିକୁ ସୁବ୍ୟବସ୍ଥିତ କରିବାକୁ ଓ ତାହା ସୁନ୍ଦର ଦିଶିବାକୁ ସେମାନେ କୁନି କୁନି ଶିବଲିଙ୍ଗର ସ୍ୱରୁପ ଦେଲେ । ସମୟ ବିତି ଚାଲିଲା । ଦେଶ ବିଭିନ୍ନ ସମୟରେ ବିଭିନ୍ନ ବୈଦେଶିକ ଶାସନ ଅଧୀନରେ ରହିଲା । ତେଣୁ ସେମାନେ ଆଉ ସୋମନାଥଙ୍କ ସ୍ୱରୁପକୁ ବାହାରକୁ ପ୍ରକାଶ କରିବାର ସାହସ କରିପାରିଲେ ନାହିଁ । ପୁରାଣ କହେ, ଏକଦା ଅସହ୍ୟ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଭୋଗୁଥିବା ଚନ୍ଦ୍ରଦେବ ମହାଦେବଙ୍କଠାରେ ଶରଣ ପଶି, ତାଙ୍କୁ ପୂଜା କରି ଆରୋଗ୍ୟ ଲାଭ କରିଥିଲେ । ପ୍ରାଣ ଶୀତଳ ହେବାରୁ ସେ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେଇଥିଲେ । ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ମଥାରେ ଧାରଣ କରୁଥିବା ମହାଦେବ ସେହିଦିନଠାରୁ ସୋମନାଥ ବୋଲାଇଲେ । ସୋମନାଥ ଅର୍ଥାତ୍ ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ନାଥ ।

    ସେହିସବୁ ଲିଙ୍ଗମାନଙ୍କର ଥିଲା ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଜନକ ଭାବରେ ଚୁମ୍ବକୀୟ ଶକ୍ତି । ଇତିହାସ କହେ, ସୋମନାଥ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ କେବେ ଭୂମି ସ୍ପର୍ଶ କରି ନ ଥିଲେ । ସର୍ବଦା ବାୟୁରେ ଝୁଲନ୍ତା ଅବସ୍ଥାରେ ରହୁଥିଲେ । ଚୁମ୍ବକୀୟ ଶକ୍ତି ଥିବାରୁ ତଳେ ଥିବା ଭିତ୍ତିଭୂମି ଓ ଉପରେ ଥିବା ଲିଙ୍ଗ ମଧ୍ୟରେ ପାରସ୍ପରିକ ବିକର୍ଷଣ ବଳରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ ଶୂନ୍ୟରେ ଦୋଳାୟମାନ ଅବସ୍ଥାରେ ରହୁଥିଲେ । ଏ ଅଲୌକିକ ଘଟଣାକୁ ଦେଖି ସେତେବେଳେ ଆକ୍ରମଣକାରୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ନ ହୋଇ ରହିପାରି ନ ଥିଲେ । ଏହାପରେ ବିତିଗଲା ପ୍ରାୟ ନଅଶହ ବର୍ଷ । ବଂଶାନୁକ୍ରମିକ ଭାବରେ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରୀ ବଂଶଜମାନେ ଉକ୍ତ କତିପୟ ଶିବଲିଙ୍ଗମାନଙ୍କର ଦେଖାରଖା କରୁଥିଲେ । ଆଜିକୁ ପ୍ରାୟ ଏକଶହ ବର୍ଷ ତଳେ ଅର୍ଥାତ୍ 1924 ମସିହାରେ ତତ୍କାଳୀନ କାଞ୍ଚି ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ଉକ୍ତ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରୀ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ କହିଥିଲେ, ଶହେବର୍ଷ ପରେ ତୁମେମାନେ ଏହାକୁ ଗୁରୁଦେବ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ରବିଶଙ୍କରଙ୍କୁ ନେଇ ପ୍ରଦାନ କରିବ । ସେ ହିଁ ଏହାର ଉପଯୁକ୍ତ ତତ୍ତ୍ୱାବଧାନ କରିପାରିବେ । ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗକୁ ଉପଯୁକ୍ତ ଓ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ପ୍ରଦାନ କରିପାରିବେ । ଏହାକୁ ଅକ୍ଷରେ ଅକ୍ଷରେ ପାଳନ କରି ବର୍ତ୍ତମାନର ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରୀ ବ୍ରାହ୍ମଣ ସୀତାରାମ ଶାସ୍ତ୍ରୀ ବିଗତ 2025 ଜାନୁଆରୀ ମାସରେ ପବିତ୍ର ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ଆର୍ଟ୍ ଅଫ୍ ଲିଭିଂ ବେଙ୍ଗାଳୁରୁସ୍ଥିତ ଆଶ୍ରମକୁ ଆସିଥିଲେ । ଗୁରୁଦେବଙ୍କୁ ଭେଟି ଆମୂଳଚୁଳ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ କହିଥିଲେ । ଗୁରୁଦେବ ଏହା ଶୁଣି ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭାବବିହ୍ୱଳିତ ହୋଇ ଉଠିଥିଲେ । ତାଙ୍କଦ୍ୱାରା ଏପରି ଏକ ମହାନ୍ କାମ ରୂପ ନେବାକୁ ଯାଉଛି ଏବଂ ତାଙ୍କର ବହୁ ପୂର୍ବରୁ ଶଙ୍କରାଚାର୍ଯ୍ୟ ତାଙ୍କ ଦାୟିତ୍ୱ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରି ଯାଇଥିବାରୁ ସେ ନିଜକୁ ଭାଗ୍ୟବାନ୍ ମନେ କଲେ ।

 

(ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ ଅଂଶବିଶେଷ ସହ ଦେଶର କୋଣ ଅନୁକୋଣକୁ ଯାଉଛନ୍ତି ଗୁରୁଦେବ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ରବିଶଙ୍କର)

    ଚନ୍ଦ୍ର ଏହି ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଙ୍କୁ ପୂଜା କରି ନିଜ କଷ୍ଟକୁ ଲାଘବ କରି ପାରିଥିଲେ, ସେହି ମହାନ୍ ଶିବଲିଙ୍ଗ କେବେହେଲେ ଭୂମି ସ୍ପର୍ଶ କରୁ ନ ଥିଲେ । ତାଙ୍କଠାରେ ପ୍ରଚୁର ର୍ଜା ବା ଶକ୍ତି ନିହିତ ଥିବାର ମଧ୍ୟ ପ୍ରମାଣ ରହିଛି । ଯେହେତୁ ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସମ୍ପର୍କ ମନ ମସ୍ତିଷ୍କ ସହ ରହିଛି, ତେଣୁ ବେଳେବେଳେ ଚନ୍ଦ୍ରଗ୍ରହଣ ସମୟରେ କାହାରି କାହାରି ମନ ବିଚଳିତ ହୁଏ । ଏପରି ସମୟରେ ଶିବଙ୍କ ଆରାଧନା ହିଁ ଏକାନ୍ତ ଉପଚାର ହୋଇଥାଏ । କାରଣ ସେ ଚନ୍ଦ୍ରକୁ ନିଜ ମସ୍ତକ ବା ଜଟାରେ ଧାରଣ କରିଥାନ୍ତି । ଗୁରୁଦେବ କହନ୍ତି, ମୁନ୍, ମାଇଣ୍ଡ, ମେଡିଟେସନ୍ ଏବଂ ମହାଦେବଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅନ୍ତର୍ନିହିତ ସମ୍ପର୍କ ରହିଛି । ଅଗ୍ନିହୋତ୍ରୀ ସୀତାରାମ ଶାସ୍ତ୍ରୀ ବିଗତ 21 ବର୍ଷ ଧରି ସ୍ୱୟଂ ସୋମନାଥଙ୍କ ଏହି ଶିବଲିଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକର ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦାୟିତ୍ୱରେ ଥିଲେ । ତେବେ ସେ ଯେଉଁ ପରିପ୍ରେକ୍ଷୀରେ ଏହାକୁ ଗୁରୁଦେବ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ରବିଶଙ୍କରଙ୍କୁ ପ୍ରଦାନ କଲେ, ତାହା ମଧ୍ୟ ଆମମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟର ବିଷୟ ଅଟେ । ଶ୍ରୀ ଶାସ୍ତ୍ରୀଙ୍କ କହିବାନୁସାରେ, ନିଜ ଘରେ ଆତ୍ମାର୍ଥ ପୂଜା ହେଉଥିବା ବେଳେ ମନ୍ଦିର ଏବଂ ସାମୂହିକ ପୂଜାସ୍ଥଳୀଗୁଡ଼ିକରେ ପରାର୍ଥ ପୂଜା ହୋଇଥାଏ । ତେଣୁ ମୁଁ ଚିନ୍ତାକଲି, ଏହି ଶିବଲିଙ୍ଗକୁ ଏହାର ଉପଯୁକ୍ତ ତତ୍ତ୍ୱାବଧାରକ, ଅର୍ଥାତ୍ ଗୁରୁଦେବ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ରବିଶଙ୍କରଙ୍କୁ ପ୍ରଦାନ କରିବି ଓ ସମାଜର ମଙ୍ଗଳ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଶିବଲିଙ୍ଗଙ୍କର ବ୍ୟବହାର ହେବ । ଏହାଦ୍ୱାରା ମୋ ପୂର୍ବପୁରୁଷଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନ ମଧ୍ୟ ପୂରଣ ହେବ । ଆମ ଦେଶକୁ ମଧ୍ୟ ଏକ ଉତ୍ତମ ଭବିଷ୍ୟତ ମିଳିବ । ସେଥିପାଇଁ ମୁଁ ଏହାକୁ ଆଣି ଗୁରୁଦେବ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ  ରବିଶଙ୍କରଙ୍କୁ ପ୍ରଦାନ କଲି । ଏହାପରେ ସେ ସୋମନାଥଙ୍କର ପ୍ରାଚୀନତମ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗର ଏଗାର ଖଣ୍ଡ କ୍ଷୁଦ୍ର କ୍ଷୁଦ୍ର ଅବୟବ ପ୍ରଦାନ କଲେ । ତାଙ୍କର ଏହି ଚିନ୍ତାଧାରାକୁ ଗୁରୁଦେବ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ରବିଶଙ୍କର ଭୂୟସୀ ପ୍ରଶଂସା କରିଛନ୍ତି ।

(ବେଙ୍ଗାଳୁରୁ ଆଶ୍ରମରେ ସ୍ଥାପିତ ଅଲୌକିକ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗ)

    ଗୁରୁଦେବ ତାଙ୍କ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ ରଖି ନ୍ୟସ୍ତ କରାଯାଇଥିବା ଗୁରୁ ଦାୟିତ୍ୱ ପ୍ରତି ଅତି ମାତ୍ରାରେ ସମ୍ବେଦନଶୀଳ ଅଛନ୍ତି । ସେଇଥିପାଇଁ ତ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକ ଧରି ଆଜିକୁ ପ୍ରାୟ ଏକବର୍ଷ ଧରି ଦେଶର ସମସ୍ତ ତିରିଶଟି ଯାକ ରାଜ୍ୟର ସମସ୍ତ ଅଞ୍ଚଳ ଭ୍ରମଣ କରୁଛନ୍ତି । ଦେଶର ସମସ୍ତ ଅଞ୍ଚଳର ଲୋକେ ଏଭଳି ଅଲୌକିକ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଙ୍କୁ ଦେଖି, ତାଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟ ଲାଭ କରି ନିଜକୁ କୃତ୍ୟ କୃତ୍ୟ ମନେ କରୁଛନ୍ତି । ବର୍ତ୍ତମାନ ଏହା ଦେଶର ବିଭିନ୍ନ କୋଣ ଅନୁକୋଣକୁ ନିଆଯାଇ କୋଟି କୋଟି ଭକ୍ତ ଓ ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁଙ୍କ ଦର୍ଶନ ଓ ପୂଜା ପାଇଁ ଉପଲବ୍ଧ କରାଯାଉଛି । ତାହାପରେ ଏହାକୁ ତାର ପ୍ରକୃତ ଆବାସ ସୋମନାଥଙ୍କ ମନ୍ଦିରକୁ ନିଆଯିବ ।

    ଏହି କ୍ରମରେ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟର ସମାବର୍ତ୍ତନ (ସଂଯୋଗବଶତଃ ଏହା ମଧ୍ୟ ଥିଲା ଗୁରୁଦେବଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟର ଦ୍ୱାଦଶ ସମାବର୍ତ୍ତନ ଉତ୍ସବ) ଉତ୍ସବରେ ଯୋଗ ଦେଇଥିବା ଗୁରୁଦେବ ସେହି ପବିତ୍ର ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଙ୍କୁ ସାଙ୍ଗରେ ନେଇ ଆସିଥିଲେ । ଦ୍ୱାଦଶ ସମାବର୍ତ୍ତନ ଉତ୍ସବରେ ଦ୍ୱାଦଶ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ସବୁଠୁ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ସୋମନାଥଙ୍କ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗକୁ ନେଇ ଆଗମନ କରିଥିଲେ ଗୁରୁଦେବ । ଓଡ଼ିଶାର ବିଭିନ୍ନ ଜିଲ୍ଲାରେ ଉତ୍ସୁକ ଜନସାଧାରଣଙ୍କ ଦର୍ଶନ ନିମନ୍ତେ ଏହାକୁ ଆର୍ଟ ଅଫ୍ ଲିଭିଂ ସ୍ୱେଚ୍ଛାସେବୀମାନେ ବୁଲାଇବାକୁ ନେଇ ଯାଇଥିଲେ । ଏହାପରେ ବେଙ୍ଗାଳୁରୁ ଆଶ୍ରମକୁ ନେବା ପୂର୍ବରୁ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ ପରିସରରେ ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୋଇଥିଲା ରୁଦ୍ରାଭିଷେକ ବା ରୁଦ୍ରପୂଜା । ପୂଜା ଉପରାନ୍ତେ ଏହି ଅଲୌକିକ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକୁ ଧରି ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟର କୁଳପତି ପ୍ରଫେସର (ଡ.) ତେଜପ୍ରତାପ ଓ କାର୍ମିକ ନିର୍ଦ୍ଦେଶକ ସ୍ୱାମୀ ସତ୍ୟଚେତନ୍ୟ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଭାବରେ ବେଙ୍ଗାଳୁରୁକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଥିଲେ ।

     ତେବେ ଗୁରୁଦେବଙ୍କ କହିବା କଥା, ଉପଯୁକ୍ତ ସମୟ ଦେଖି କିମ୍ବା ପ୍ରକୃଷ୍ଟ ସମୟ ଉପନୀତ ହେଲେ ଉକ୍ତ 11 ଖଣ୍ଡ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଙ୍କୁ ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିରକୁ ନିଆଯିବ । ଏଥିସହ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ପୂଜାର୍ଚ୍ଚନା ଦ୍ୱାରା ମନ୍ଦିରରେ ସେମାନଙ୍କୁ ଅଧିଷ୍ଠାନ କରାଯିବ । ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ କଥା ହେଉଛି, ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ନରେନ୍ଦ୍ର ମୋଦି ହେଉଛନ୍ତି ସୋମନାଥ ମନ୍ଦିର ଟ୍ରଷ୍ଟର ଅଧ୍ୟକ୍ଷ । ତେଣୁ ଚୂଡ଼ାନ୍ତ ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେବା ନିମନ୍ତେ ସିଏ ହିଁ ହେଉଛନ୍ତି ଉପଯୁକ୍ତ ବ୍ୟକ୍ତି । ସେଥିପାଇଁ  ତାଙ୍କୁ ଭେଟି ଏ ସମ୍ପର୍କରେ ପରବର୍ତ୍ତୀ ସିଦ୍ଧାନ୍ତ ନିଆଯିବ । ଏଥିପାଇଁ ଉଭୟ ଗୁଜରାଟ ରାଜ୍ୟ ଓ କେନ୍ଦ୍ର ସରକାରଙ୍କ ସହଯୋଗ ଲୋଡ଼ାଯିବ ।

(ଶ୍ରୀ ଶ୍ରୀ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟକୁ ଆସିଥିବା ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗର ଅଂଶବିଶେଷ)

     ଇଏ ତ ଗଲା ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗମାନଙ୍କର ସୁରକ୍ଷା ଓ ପୁନରୁଦ୍ଧାର ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ତଥ୍ୟ, ଯାହା ସତ୍ୟ । ତେବେ ଏହାର ବୈଜ୍ଞାନିକ ଦିଗଟି ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ଦୃଷ୍ଟି ଦେବା ସର୍ବାଦୌ ଆବଶ୍ୟକ । ଆଉ ତାହା ହେଲା, ଲିଙ୍ଗଗୁଡ଼ିକର ସ୍ଥିତିକୁ ଦେଖି ଏହା ହଜାର ହଜାର ବର୍ଷ ତଳର ବୋଲି ଖୋଦ୍ ବୈଜ୍ଞାନିକମାନେ ମଧ୍ୟ ପରିପୁଷ୍ଟ କରିଛନ୍ତି । ପୂଜକମାନେ ପୂଜା କରି ଆସୁଥିବା ଏହି ପଥରଗୁଡ଼ିକର ଚୁମ୍ବକୀୟ ଶକ୍ତି ଥିବାରୁ ମୂଳ ଜ୍ୟୋତିର୍ଲିଙ୍ଗଟି ଶୂନ୍ୟରେ ଭାସମାନ ଅବସ୍ଥାରେ ରହୁଥିଲା । ବୈଜ୍ଞାନିକମାନେ ଏହି ପଥରଗୁଡ଼ିକୁ ପରୀକ୍ଷା କରିବା ପରେ ଅବିଶ୍ୱସନୀୟ ଫଳ ପାଇଥିଲେ । ଭୂବିଜ୍ଞାନ ତଥା ମିନେରାଲ୍ ଏକ୍ସପ୍ଲୋରେଶନ୍ କର୍ପୋରେସନ୍ ଅଧିକାରୀ ଶ୍ରୀ ଚନ୍ଦ୍ରଶେଖର ନେତ୍ରବିଲେ କହନ୍ତି, ମୁଁ କେବେ ମଧ୍ୟ ଚୁମ୍ବକୀୟ ଗୁଣ ଥିବା କୌଣସି ଧଳାବର୍ଣ୍ଣର ପଥର ଦେଖି  ଥିଲି । ଏହା କେବଳ ଯେ ଚୁମ୍ବକୀୟ, ତାହା ନୁହେଁ, ଅଧିକନ୍ତୁ ଏହାର ଚୁମ୍ବକୀୟ କ୍ଷେତ୍ର ଅନ୍ୟ ସାଧାରଣ ଚୁମ୍ବକ ଭଳି ତାହାର ପାର୍ଶ୍ୱରେ ନୁହେଁ, ବରଂ ଏହାର କେନ୍ଦ୍ରରେ ରହିଥିବା ମୋତେ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟାନ୍ୱିତ କରିଛି ।ଏହି ପଥରରେ ପ୍ରାୟ କୌଣସି ଲ ଅଂଶ ନାହିଁ, ଯାହା ଚୁମ୍ବକୀୟ ଗୁଣ ପାଇଁ ଅତ୍ୟାବଶ୍ୟକ  ପୃଥିବୀ ସଂରଚନାରେ ଏପରି କୌଣସି ସାମଗ୍ରୀ ନ ଥିଲା, ଯେଉଁଥିରେ ଚୁମ୍ବକୀୟତା ରହିଛି । ଏହା ବୈଜ୍ଞାନିକମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସ୍ତମ୍ଭୀଭୂତ କରିଥିଲା । ତେବେ ଏହା ସିଧାସଳଖ ଆକାଶରୁ ଖସିଥିବା ନେଇ ରହିଥିବା ଐତିହାସିକ ଓ ପ୍ରାଚୀନ କିମ୍ବଦନ୍ତୀ ପଛରେ ଯେ ସତ୍ୟତା ନାହିଁ, ଏହା ଆଦୌ କହିହେବ ନାହିଁ ।


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